Priyabhishek Sharma is an Indian Spiritual Author

Hello Friends! Welcome. My name is Priyabhishek Sharma. 

 I have done doctorate in International Relations from Himachal Pradesh University, Shimla. I have been working as an Assistant Professor with the Department of Higher Education Himachal Pradesh since last one decade.
In the professional space, I had many publications in the reputed journals on the foreign policy and international relations in which I specialize. I have also published a book on the  contemporary world order titled:

The Alliance without Enemy: A Post Cold War History of West 

Another book bearing my name Priyabhishek Sharma as the author is The UPSC Odyssey: Daring to Dream an IAS Officer.  The major theme of this book is the most popular competitive exam among the Indian youth: The Civil Services Exam. One million Indian youth apply for this exam every year but only less than one per cent of them qualify.  Why? Is it because of extraordinary calibre, hard work, or luck? Nay; neither. It is the game of mind management- a journey from the wavering mind to the focused mind, from dreaming to conviction. The dominant genre of this book setting it apart from similar books in the market is its focus on the role of mind management in this exam.

Now let’s come to what actually I am. My first and last identity is that of a seeker- a seeker of the wonders and mysteries of life. That’s what I have been doing for the last two decades. And, my journey has brought me to three Ms: Mind, Meditation and Monks. When these three Ms commingle, success happens in life.

How this person named as Priyabhishek Sharma reached into three Ms: Mind, Meditation and Monks is an interesting story. My latest book The Himalayan Master and The Sixth Sense describes this journey.

 I have been meditating for almost two decades. Kriya Yoga Meditation combined with the Shakta Sadhna, where one invokes the Kundalini Shakti as the Divine Mother, is what I have been doing. I observed this quest at self-realization passing through the four phases:

Initial Stage of Ambivalence: A Himalayan Yogi initiated me almost two decades back. As an adolescent, I was agnostic, rational and even rebellious. I don’t know-how on that day I could agree to get initiated and why my habitual rebellion had acquiesced. But he had given me a beej (Vedic Hymyn) mantra, which I searched and not found anywhere, not even in the Google. He, later
on, explained that the mantra had since five thousand years been orally transmitted from master to disciple. Meditating with this mantra, for about two years, certain psychological and physiological changes took place as I became a more relaxed, more intelligent person. Meditation was fun in addition to the other activities of student life.

Intermediary Stage of Sixth Sense: I was going along normally as a university student until on one night a weird dream took place, in which my mind connected with the question paper of an exam I was to appear two weeks later. The one question which I could read after lots of efforts actually came in the paper. I was stunned, awed and also excited. Then, one after another, the frequency of these intuition-related-experiences increased and I was not the same person. I had now become a serious seeker. Somehow finding that Yogi and telling him my plight, I was told that
I was undergoing a paranormal skill, which was a treasure of my previous births.

Stage of Exploration: In this stage, I had become a serious seeker. I explored these dimensions as the topmost priority of life; met many yogis; read a lot; from Buddhism to Patanjali Yoga Sutra to Yogananda to Dr Brian Weiss to Swami Rama, from Psychology to Philosophy. Around this time I also got initiated into the Kriya Yoga Meditation and the journey became as if I had got a jet fighter. Continuing for a decade twice a day, one day my mind stopped. I was not the same again. Now the time in meditation lapsed, sometimes I had to apply the alarm to leave to the office in time. The entire day, I would feel intoxication never felt before. My mental abilities, memory and concentration had become extraordinary. I could listen to some subsonic sounds, mild, very melodious, soothing, whenever I would be alone. This was a buzz always playing. I was again scared not knowing what had happened to me.

The fourth stage of Actual Seeking: Searching for the sincere guidance finally my journey culminates at the feet of an ageless Master. A mere touch of his eyes was enough to understand my plight. And, what I had all along these years been searching happened in an instant. I had found lasting refuge. This was my brief journey. My latest book The Himalayan Master and the Sixth Sense describes this journey in detail.

“I write not to achieve but to awaken”

दोस्तो, आपका स्वागत!

मैं अपने बारे में कुछ आपको बताता हूँ! मैं हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से राजनीती विज्ञान में डॉक्टरेट हूँ! पिछले एक दशक से सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दे रहा हूँ! कुछ हल्का -फुल्का लिख भी लेता हूँ! परन्तु मैं मूलतः एक अपने अंतरमन की यात्रा पर निकला हुआ एक साधक हूँ! यही मेरी प्रथम एवं अंतिम पहचान है! बाकि तो रास्ते पर चलते कुछ पड़ाव आते चले गए! मैं लगभग पिछले बीस वर्षों से ध्यान करता आ रहा हूं! मैं क्रिया योग तथा दस महाविद्या का साधक रहा हूं! इस दौरान मैंने अपने आप को निम्नलिखित चरणों से होकर गुजरते हुए महसूस किया है!

उत्सुकता की प्रथम अवस्था:

एक किशोर के रूप में मैं जिद्दी तथा परिणामों की परवाह न करने वाला शख्स था! ईश्वर के प्रति मेरा दृष्टिकोण अज्ञेयवादी ही अधिक था! एक दिन अचानक ही एक हिमालयन योगी का घर आना हुआ! उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर मैंने उनसे दीक्षा लेना स्वीकार किया! आज भी यह सोच कर हैरान होता हूं कि कैसे उस दिन मेरा विद्रोही मस्तिष्क दीक्षा के लिए राजी हो गया !उन्होंने मुझे एक बीज मंत्र दिया था एवं बिना किसी बंधन के उस बीज मंत्र के साथ 15 मिनट प्रतिदिन ध्यान करने का सुझाव दिया ! एक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट के रूप में ध्यान अन्य मनोरंजन की गतिविधियों से अधिक कुछ न था! हां, परंतु प्रतिदिन 15 मिनट मैं ध्यान अवश्य किया करता था! प्रथम 2 वर्षों में मैंने अपने आप में कुछ सकारात्मक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन अनुभव किए! अब मैं अधिक शांत तथा बुद्धिमान दिखता था!

सिक्स्थ सेंस की दूसरी अवस्था:
जीवन सामान्य रूप से चल रहा था कि अचानक एक रात हॉस्टल में सोते हुए एक अजीब सपना घटित हुआ! बहुत लंबे समय तक मेरा मस्तिष्क दूर किसी दस्तावेज में लिखे कुछ शब्दों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था! काफी लंबे संघर्ष के पश्चात उन शब्दों को जोड़कर एक वाक्य उभरा, जैसे ही मैंने वाक्य के अर्थ को आत्मसात किया, झट से मेरी नींद खुल गई! एक हफ्ते के पश्चात मैं यूजीसी नेट की परीक्षा में शामिल हुआ! मेरी हैरानी का उस वक़्त कोई ठिकाना नहीं रहा जब मैंने 40 अंकों के प्रश्न के रूप में सपने में आये दस्तावेज को पाया! उस प्रश्न को मैंने पहले ही तैयार कर लिया था, यद्यपि उसके पेपर में आने की सम्भावना के बारे आश्वस्त बिलकुल भी न था! मैं उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया था !तत्पश्चात इस प्रकार केअनुभवों का सिलसिला बढ़ता चला गया एवं मेरी दुनिया बदलती चली गई !मैं डर सा गया था ,मुझे नहीं पता था कि जो मेरे साथ हो रहा है वह उचित है अथवा नहीं! कड़ी मशक्कत के पश्चात मैंने उस योगी को पुनः ढूंढा एवं अपनी विचित्र परिस्थिति के बारे में उन्हें अवगत करवाया! यह सुनकर वह पहले तो भावुक हुए, फिर मेरी आंखों में झांकते हुए बताया कि इसे पैरानॉर्मल स्किल के रूप में जाना जाता है! उनके अनुसार संत परंपरा में इस प्रकार के अनुभव को बहुत भाग्यशाली माना जाता है कि आपने अपने पूर्व जन्मों की तपस्या का खजाना ढूंढ निकाला! परंतु साथ में उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह मात्र शुरुआत है ! सुनकर कुछ आश्चर्य हुआ, परन्तु मेरे जीवन की किश्ती किसी और ही यात्रा पर निकल पड़ी थी!

जिज्ञासा की तृतीय अवस्था:
इस अवस्था में मैं बहुत पढ़ा, कई योगियों से मिला, विभिन्न प्रयोग करता चला गया, जो हाथ लगा अजमाया! मेरी स्थिति
उस बच्चे के समान थी जिसे एक नया खिलौना मिल गया था एवं जो इस खिलौने के साथ प्रत्येक व्यक्ति एवं मित्र के पास भाग रहा था ! मैंने डॉक्टर ब्रायन वेइस से लेकर स्वामी योगानंद, विवेकानंद, स्वामी राम द्वारा रचित हिमालयन योगियों एवं
योग पर लिखित पुस्तकों का अध्ययन किया; मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, साहित्य का गहन अध्ययन किया! इसी दौरान क्रिया योग ध्यान की वैज्ञानिक विधि में मेरी दीक्षा हुई! अब मानो यात्रा के लिए मेरे पास लड़ाकू विमान आ गया था! ध्यान धीरे-धीरे गहरा होता गया, परंतु मैं अपने जीवन मैं संतुलन बनाकर शांत जीवन जीता चला गया!

वास्तविक बोध की अवस्था:
प्रत्येक दिन सुबह शाम नियमित रूप से मैं ध्यान करता रहा! एक दिन विचित्र घटना घटी! मई माह के उस दिन को कभी नहीं भूल सकता !उस दिन ध्यान में मेरा मन पूर्णतया रुक गया! विचार शून्य, शिथिल, गहन मौन कि अवस्था में लीन हो गया! ध्यान से जब उठा पाया साढ़े तीन घंटे का समय गुजर चुका था, मुझे तो यूं लगा कि बमुश्किल आधा घंटा ही हुआ होगा
! उसके बाद प्रत्येक दिन ज्यों ही मैं ध्यान में बैठता, समय एवं स्वयं दोनों को खो बैठता! सुबह के समय तो मुझे अलार्म लगाना पड़ता, कि कहीं ऑफिस के लिए लेट ना हो जाऊं! इसी दौरान एक अजीब सी अंतरध्वनि मेरे कानों के भीतर गूंजने लगी! यह एक मंद सी गूँज थी, एक नाद सा, जो अनवरत चलायमान था! जब भी मैं एकांत में बैठता, इस ध्वनि में खो जाता! मेरे मित्रों ने मुझ में परिवर्तन अनुभव किया! कईयों ने सलाह दी कि मैं एक बार अस्पताल हो लूँ ! मैंने भी टेनाइसिस नामक एक बीमारी के बारे में सुना था जिसमें कान में ध्वनि सुनाई देती है! कुछ डरा सा, कुछ सहमा सा, मैं संतो से मार्गदर्शन की प्रार्थना कर रहा था! नाव मंझधार में अटक गयी थी, किनारा कहीं दिखता नहीं था! उसी समय चमत्कारी तरीके से एक अन्य संत का अनायास ही जीवन में प्रवेश हुआ! उनको अधिक बताने की आवश्यकता न पड़ी! मात्र एक बार बताया एवं उन्होंने आंखों में झांक कर देखा! उसके पश्चात बोला,नौकरी क्यों करता है? रोजी रोटी के लिए! बहुत अच्छे, कहकर वह मौन हो गए !15-20 मिनट रुकने के पश्चात उन्होंने मुझे आश्रम के ध्यान कक्ष में जाने का आदेश दिया! वह अद्वितीय घटना थी ! इस प्रकार मेरी यात्रा वास्तविक गुरु के चरणों में जा ठहरी थी! जिसे स्वयं अट्ठारह वर्षों से प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था, वह तत्क्षण ही घटित हो गया! प्रभु की माया विचित्र है!

इस यात्रा को यहां अनुभव करने का उद्देश्य अपने लिए शिष्य अर्जित करना बिल्कुल भी नहीं है! मैं भी आप के समान ही अंतर्विरोध से जूझता हुआ एक आम आदमी हूं! मेरे गुरुओं द्वारा मुझे इन विद्याओं को किसी को भी आगे बताने के लिए अधिकृत बिलकुल भी नहीं किया है! परंतु प्रेरणा का आदेश जरूर दिया है! इस यात्रा से आपके जीवन में यदि ध्यान एवं अध्यात्म के प्रति जाग्रति घटित होती है, तो मैं अपने उद्देश्य को सफल मानूंगा! इसी यात्रा को मेने अपनी तृतीया पुस्तक THE HIMALYAN MASTER AND THE SIXTH SENSE के माध्यम से आप लोगों से साँझा करने का प्रयास किया है! जल्दी ही इस पुस्तक का हिंदी संस्करण भी बाजार में उपलब्ध करवाया जायेगा!